Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 103, Verse 32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 103, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 103 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

सत्त्वस्यानुपलम्भोऽस्ति न तस्योपशमादृते । यावद्भाति समं तत्त्वं कालाच्छाम्यति केवलम् ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्त में हर्षादि विकारों का उपशम हो जानेपर शरीर में भी विकार निवृत्त हो जाते हैं। चित्त की शान्ति हो जानेपर निर्वासनिक चित्त द्वारा अस्मरण से त्यागी गई भी भावविकारों की जननी यह देह आकाश की नाई पुरुष को बाधित नहीं करती । निष्कर्ष यह निकला कि चित्त का अहन्त्वरूप से स्वीकार ही देह में वृद्धि आदि विकारों का कारण है। जैसे समान जलसन्तति में तरंग आदि की उत्पत्ति नहीं होती वैसे ही समान वासनारहित चित्तसन्ततिदशा में जरा आदि विकार या राग आदि दोष नहीं दिखाई पड़ते ॥ ३०, ३ १॥ कितने समय तक जीवन्मुक्त निवसिनिक मन को देखते हैं, ऐसी यदि शंका हो, तो अवशिष्ट प्रारब्ध के क्षय द्वारा जबतक उसका विनाश न हो तब तक, यों उत्तर देते है। सत्त्व के उपशम के बिना सत्त्व का अनुपलम्भ नहीं होता। जव प्रातिभासिक वैषम्य से निर्मुक्त तत्त्व दिखाई पडता है तभी अवशिष्ट प्रारब्धविनाशकाल में वह पूर्णरूप से विलीन हो जाता है