Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 103, Verses 52–60
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 103, verses 52–60 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 103 · श्लोक 52-60
संस्कृत श्लोक
भवद्वितीर्णया योगयुक्त्या विश्रान्तवानहम् ।
यथा साधो तथा मन्ये स्वर्गे विश्रमणं कुतः ॥ ५२ ॥
तामेव संस्थितिं स्वच्छामवलम्ब्य प्रकाशिनीम् ।
विहरेह यथाकामं स्वर्गे भूमितले तथा ॥ ५३ ॥
कुम्भ उवाच ।
परे पदे महानन्दे कच्चिद्विश्रान्तवानसि ।
इदं भेदमयं दुःखं कच्चित्संत्यक्तवानसि ॥ ५४ ॥
कच्चिदापातरम्येभ्यः संकल्पेभ्यो रतिर्भृशम् ।
निर्मूलतां गता राजन्भोगनीरसमेव ते ॥ ५५ ॥
हेयादेयदशातीतं शान्तं शमसमस्थिति ।
यथाप्राप्तेष्वनुद्वेगं कच्चित्तव मनःस्थितम् ॥ ५६ ॥
शिखिध्वज उवाच ।
त्वत्प्रसादेन भगवन्दृष्टा दृश्यातिगा गतिः ।
प्राप्तः संसारसीमान्तो लब्धो लब्धव्यनिश्चयः ॥ ५७ ॥
चिरादतिचिरेणैव विश्रान्तोऽस्मि निरामयः ।
लब्धं लव्धव्यमखिलं तृप्तः संश्चिरसंस्थितः ॥ ५८ ॥
नोपदेष्टव्यमस्माकं किंचिदप्युपयुज्यते ।
सर्वत्रैवातितृप्तोऽस्मि संस्थितोऽस्मि गतज्वरः ॥ ५९ ॥
ज्ञातमज्ञातमप्राप्तं त्यक्तं त्यक्तव्यमाश्रितम् ।
तत्त्वं परत्वं सत्त्वं मे स्वस्यैवास्ति न किंचन ॥ ६० ॥
हिन्दी अर्थ
आपके द्वारा बतलाई गई समाधि से जनित जो सुख है, उससे तृप्त मुझे भी स्वर्ग की इच्छा नहीं
होती ।
आपके द्वारा बतलाई गई योगयुक्त से जैसे मैं विश्राम ले रहा हूँ, हे साधो, मैं समझता हूँ कि स्वर्ग
में भला वैसा विश्राम कहाँ से होगा । जिस भूमानन्द संस्थिति का आपने मुझे उपदेश दिया है उसी
स्वच्छ स्वप्रकाशस्वरूप स्थिति का अवलम्बनकर आप यहाँ यथेच्छ स्वर्ग या भूतल में विहार कीजिये।
कुम्भ ने कहा : हे राजन्, परमानन्द परमपद में क्या आप विश्राम ले चुके ? क्या इस भेदमय दुःख का
आप भलीभाँति त्याग कर चुके ? हे राजन्, ऊपर-ऊपर से रमणीय दिखाई दे रहे इन संकल्पो से भोगों
की नीरसतापूर्वक आपका प्रेम क्या बिलकुल निर्मूलता को प्राप्त हो गया हेय ओर उपादेय दशा को
अतिक्रान्त कर गया ? शम से समस्थिति से युक्त शान्त आपका मन क्या प्रारब्धवश प्राप्त विषयों में
उद्रेगशन्य होकर अवस्थित हो गया ? राजा शिखिध्वज ने कहा : हे भगवन्, आपकी दया से मैंने वह
गति देख ली, जो दृश्यों को अतिक्रान्त कर चुकी है; मेने संसार की सीमा का अन्त पाया ओर लाभ
करने योग्य वस्तु का लाभ कर लिया । चिरकाल के बाद थोड़े समय तक ही यानी केवल तीन दिन तक
(८) इससे तपस्या के प्रभाव से पूर्वसंचित फूलों में अम्लानता प्रकट होती है ।
ही निरामय होकर मैंने विश्राम किया, प्राप्त करने योग्य सब प्राप्त कर लिया, अब मैं तृप्त होकर चिरकाल
के लिए स्थित हूँ। अब हमें किसी तरह का उपदेश देना उपयुक्त नहीं है। सर्वत्र ही मेँ अतितृप्त हो गया
हूँ। सन्तापादि सांसारिक ज्वर से शून्य होकर मैं अवस्थित हूँ। मैंने अज्ञात का ज्ञान कर लिया, अप्राप्त
की प्राप्ति कर ली, छोड़ने योग्य वस्तु छोड़ दी तथा मेरा मन वासनाशून्य हो गया और मैंने आत्मा के
तत्त्वरूपी परत्व का आश्रय कर लिया। अब मुझसे अतिरिक्त कोई अवशिष्ट नहीं है