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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 104, Verses 17–20

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 104, verses 17–20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 17-20

संस्कृत श्लोक

निजः पतिरुदारात्मा निराधिश्च नवं वयः । गृहाणि पुष्पजालानि सा हता या न कामिनी ॥ १७ ॥ वनपुष्पलतागेहे स्वायत्ते भर्तरि प्रिया । रमते या न निर्दुःखा सा हतैव दुरङ्गना ॥ १८ ॥ रम्यं विवाहितं कान्तं पतिमासाद्य निर्जने । स्त्री सती या न रमते तां धिगस्तु दुरङ्गनाम् ॥ १९ ॥ समुज्झता यथाप्राप्तमपि वेद्यविदा सदा । अनिन्द्यं समुदारार्थं किं तज्ज्ञेन कृतं भवेत् ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

अधर्म, रोग ओर श्रम आदि के कारणभूत भोगो से लोकसंग्रह के लिए दूर हट जाना चाहिए, यह ठीक है, परन्तु यहाँ उनकी प्रसक्ति है ही नहीं, इस आशय से कहते हैं। यह अपना स्वामी उदारात्मा है, रोगनिर्मुक्त है, इसकी नयी अवस्था है ओर ये सब कुसुमसमूह घर हैं, इस तरह की सब सामग्रियों के उपस्थित रहते भी जो स्त्री अपने स्वामी में अनुरागवती नहीं होती वह यदि अजीवन्मुक्ता है तो अपने स्वामी के उपभोग के विनाश से जनित पाप से बिलकुल नष्ट हो चुकी है ओर यदि वह जीवन्मुक्ता है, तो लोकसंग्रह के भंग से जनित निन्दा आदि के द्वारा नष्ट हो चुकी है | वनपुष्पलताओं के घर में स्वाधीन पति के रहते जो प्रिया सुखपूर्वक रमण नहीं करती वह दुष्ट अंगना मर चुकी हे । एकान्त स्थान में सर्वागसुन्दर रमणीय अपने विवाहित पति को पाकर जो सती स्त्री रमण नहीं करती उस दुष्ट महिला को धिक्कार है । उदार अर्थ से भरे यथाप्राप्त भी अनिन्द्य अपने भोग का सदा त्याग कर रहे, वेद्य पदार्थ का ज्ञान रखनेवाले तत्त्वज्ञानी पुरुष ने कौन-सा अधिक फल उत्पन्न किया ?