Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 106, Verses 34–39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 106, verses 34–39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 34-39
संस्कृत श्लोक
इयमस्मि वधूः कान्ता भर्ता त्वं मे पुरःस्थितः ।
गृहाण काम मामेहि कालोऽयं तव हृच्छयः ॥ ३४ ॥
इति संचिन्त्य भर्तारमग्रस्थगहनस्थितम् ।
उदयन्तमिवादित्यं रतिः काममिवाभ्यगात् ॥ ३५ ॥
अहं मदनिका नाम भार्यास्मि तव मानद ।
पादयोस्ते प्रणामोऽयं सस्नेहं क्रियते मया ॥ ३६ ॥
इत्युक्त्वा सानवद्याङ्गी लज्जावनमितानना ।
लोलालकेन शिरसा प्रणनाम लसत्पतिम् ॥ ३७ ॥
उवाचेदं च हे नाथ त्वं मां भूषय भूषणैः ।
क्रमेणाग्निं च संज्वाल्य मत्पाणिग्रहणं कुरु ॥ ३८ ॥
राजसेऽतितरां राजन्मां करोषि स्मरातुराम् ।
रतेर्विवाहे मदनमभिभूयाधितिष्ठसि ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
इसीलिए कामरूप से स्वामी की कल्पना कर मन में कहते है।
यह मैं कमनीय वधू हूँ और हृदयस्थ आप भर्ता के रूप में सामने अवस्थित हें, अतः हे कामरूप,
आप आइये, मुझे स्वीकार कीजिए, यह आपका अवसर है । यों मन में विचारकर सामने वनवेदी-प्रदेश
में अवस्थित उदीयमान आदित्य के सदुश तेजस्वी भर्ता की ओर, काम की ओर रति के सदुश, बढ़ गई ।
हे मानद, आपकी मैं मदनिका नाम की भार्या हूँ, आपके चरणों में अनुरागपूर्वक प्रणाम करती हूँ । यों
कहकर निर्दोष अंगोवाली तथा लज्जा से विनम्र मुखवाली उस मदनिकाने चंचल केशवाले मस्तक से
अपने शोभ रहे पति को प्रणाम किया | फिर उसने कहा : हे स्वामिन्, पहले मुझे अलंकारो से अलंकृत
कीजिए तदनन्तर अग्नि प्रज्वलित कर शास्त्रोक्त प्रक्रिया से मेरा पाणिग्रहण कीजिए | हे राजन्, आप
इस समय खूब सुन्दर लग रहे हैं, मुझे कामपीड़ित कर रहे हँ । अधिक क्या कहूँ ? रति के विवाह में
प्रसिद्ध कामदेव का भी अपनी शोभा से तिरस्कार कर आप स्थित हैं