Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 107, Verses 27–32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 107, verses 27–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 27-32

संस्कृत श्लोक

सर्वत्रैव हि तुष्यामि सर्वत्रैव रमे प्रभो । अवाञ्छनत्वान्मनसः सर्वत्रानन्दवानहम् ॥ २७ ॥ नियतं किंचिदेकत्र स्थितं स्वर्गकमीदृशम् । शक्र गन्तुं न जानामि त्वदाज्ञां न करोम्यहम् ॥ २८ ॥ शक्र उवाच । साधो विदितवेद्यानां परिपूर्णधियां समम् । सज्जनाचरितं युक्तं मन्ये भोगोपसेवनम् ॥ २९ ॥ देवेशे प्रोक्तवत्येवं तूष्णीमेव स्थिते नृपे । किमितो नापयाम्येष त्वमिति प्रोक्तवान् हरिः ॥ ३० ॥ नाहमद्यैव कालेन वदतीति शिखिध्वजे । कल्याणं तेऽस्तु कुम्भेति वदन्नन्तर्धिमाययौ ॥ ३१ ॥ तद्देववृन्दमखिलं त्रिदशेशयुक्तं तत्र क्षणादलमदृश्यमभूद्द्वितीयम् । कल्लोलराशिरिव वारिनिधौ प्रशान्ते वाते स्फुरन्मकरफेनफणीन्द्रवृन्दम् ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

देते हुए देवराज इन्द्र अन्तर्हित हो गये । देवराज इन्द्र के अदृश्य हो जाने पर उनके साथ का दूसरा देवसमूह भी ऐसे अदृश्य हो गया, जैसे समुद्र में वायु के अदृश्य हो जाने पर व्याकुल हुए मगर, फेन, सर्प आदि से युक्त तरंगसमूह अदृश्य हो जाता हे