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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 107, Verse 9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 107, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 107 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

मासमेकं महेन्द्राद्रौ रम्ये सरलसंकुले । रत्नकुड्ये गुहागेहे पूजितौ सुरकिंनरैः ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

किस-किस स्थान में कितने-कितने समय तक वे रहे, यह बतलाते है। महीनेभर तो उन्होने महेन्द्र पर्वत के उपर के गुफाघर में निवास किया | वह घर अत्यन्त रमणीय था, उसके चारों ओर चीड के ऊँचे वृक्ष लगे थे, उसकी दीवारे रत्नशिलाओं की बनी थीं । वहाँ पर देवता ओर किन्नर उनका आगत-स्वागत खूब किया करते थे । उसके वाद उन्होंने उसी तरह पन्द्रह दिन तक शुक्तिमान्‌ पर्वत के पृष्ठ के, जो कि हाथों से लेने योग्य, अनेक दुःखों के विनाशक फल, पुष्प आदि से युक्त मन्दारो के कारण वनमाला से मालित हो गया था, कल्पवल्ली के कुज में निवास किया