Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 108, Verses 22–28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 108, verses 22–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 108 · श्लोक 22-28
संस्कृत श्लोक
अहमेतेन चार्थेन नोद्वेगं यामि मानिनि ।
यद्यदिष्टतमं लोके तत्तदेव विजानता ॥ २२ ॥
अहं कुम्भश्च तन्वङ्गि वीतरागाविहेतरा ।
दुर्वासःशापजा बाला त्वं यदिच्छसि तत्कुरु ॥ २३ ॥
मदनिकोवाच ।
एवमेष महाभाग स्त्रीस्वभावो हि चञ्चलः ।
कामो ह्यष्टगुणः स्त्रीणां न कोपं कर्तुमर्हसि ॥ २४ ॥
अबलाहमनेनास्मि रात्रौ गहनकानने ।
त्वयि संध्याजपपरे किं करोमि वराकिका ॥ २५ ॥
अबला वा कुमारी वा जारं न रतिरोधनम् ।
करोति परिखिङ्गेन नाङ्गे स्वे विनिवेशितम् ॥ २६ ॥
स्त्रियः सुन्दरतां याताः पुरपुंसामसङ्गमे ।
मन्युर्निषेध आक्रन्दः सतीत्वं किं करिष्यति ॥ २७ ॥
अबला स्त्री तथा बाला मूढाहमपराधिनी ।
क्षन्तुमर्हसि नाथ त्वं क्षमावन्तो हि साधवः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
रतिराग से बाधित हुए वे क्रोध आदि एकान्त में जार के साथ नाता जोड़ने में बाधक नहीं हो सकते । हे
स्वामिन्, मैं अबला स्त्री हूँ, बाला हूँ, मूर्ख हूँ, मेने भयंकर अपराध किया है; आप क्षमा प्रदान कीजिए,
क्योंकि साधु पुरुष क्षमाशील ही हुआ करते है