Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 109, Verses 29–50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 109, verses 29–50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 109 · श्लोक 29-41
संस्कृत श्लोक
लोकद्वयसुखं सम्यक्सर्वं यासु प्रतिष्ठितम् ।
निरिच्छायाः प्रयातायाः पारं संसारवारिधेः ॥ २९ ॥
कथमस्योपकारस्य करिष्ये ते प्रतिक्रियाः ।
मन्ये कुलाङ्गनां लोके लोके सर्वास्त्वयाधुना ॥ ३० ॥
नारीसौजन्यचर्चासु व्यपदेश्या भविष्यसि ।
त्वां निर्मितवतो धातुर्गुणजालातिशायिनीम् ॥ ३१ ॥
मन्ये प्रकुपिता नूनमरुन्धत्यादिकाः स्त्रियः ।
सती त्वं रूपसौजन्यगुणरत्नसमुद्गिके ॥ ३२ ॥
एहि मे त्वद्गुणोत्कस्य पुनरालिङ्गनं कुरु ।
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इत्युक्त्वा मृगशावाक्षीं चूडालां तां शिखिध्वजः ॥ ३३ ॥
आलिलिङ्ग पुनर्गाढं नकुलो नकुलीमिव ।
चूडालोवाच ।
देव शुष्कक्रियाजालपरे त्वय्याकुलात्मनि ॥ ३४ ॥
भूयोभूयो भृशमहं त्वदर्थं दुःखिताभवम् ।
तेन त्वदवबोधात्मा स्वार्थं एवोपपादितः ॥ ३५ ॥
मया तदत्र किं देव करोषि मम गौरवम् ।
शिखिध्वज उवाच ।
त्वया यथा वरारोहे स्वार्थः संपाद्यते शुभः ॥ ३६ ॥
तमिदानीं तथा सर्वाः साधयन्तु कुलाङ्गनाः ।
चूडालोवाच ।
बुध्यसे कान्त विश्रान्तो जगज्जालतटे विभो ॥ ३७ ॥
अद्य तं प्राक्तनं किंचिन्मोहं समनुपश्यसि ।
इदं करोमि नेदं तु प्राप्नोमीदमिति स्थितिम् ॥ ३८ ॥
अन्तर्हससि तां कच्चिद्दशापेलवतां धियः ।
तास्तुच्छतृष्णाकलनास्ताः संकल्पकुकल्पनाः ॥ ३९ ॥
त्वयि नाद्यावलोक्यन्ते देव व्योम्नीव पर्वताः ।
किं त्वमद्याङ्ग संपन्नः किंनिष्ठोऽसि किमीहसे ॥ ४० ॥
कथं पश्यसि पाश्चात्यं देहचेष्टाक्रमं विभो ।
शिखिध्वज उवाच ।
सुमनःपूर्णनीलाब्जमालासारविलोचने ॥ ४१ ॥
त्वमेव यस्य यस्यान्तस्तत्तस्याहमुपास्थितः ।
निरीहोऽस्मि निरंशोऽस्मि नभःस्वच्छोऽस्मि निस्पृहः ॥ ४२ ॥
शान्तोऽहमर्थरूपोऽस्मि चिरायाहमहं स्थितः ।
तां दशामुपयातोऽस्मि यतश्चित्तैकवर्त्मनि ॥ ४३ ॥
प्रतिषेधन्ति सहसा न यां हरिहरादयः ।
नकिंचिन्मात्रचिन्मात्रनिष्ठोऽस्मि स्वस्थ आस्थितः ॥ ४४ ॥
भ्रमेणाहं विमुक्तोऽस्मि संसारेणालिलोचने ।
न तुष्टोस्मि न खिन्नोऽस्मि नायमस्मि न चेतरत् ॥ ४५ ॥
न स्थूलोऽस्मि न सूक्ष्मोऽस्मि सत्यमस्मि च सुन्दरि ।
तेजोबिम्बात्प्रयातेन भित्तावपतितेन च ॥ ४६ ॥
क्षयातिशयमुक्तेन प्रकाशेनास्मि वै समः ।
शान्तोस्मि साम्यं नेतास्मि स्वस्थोस्मि विगताशयः ॥ ४७ ॥
परिनिर्वाण एवास्मि सदृशोऽस्मि पतिव्रते ।
यत्तदस्मि तदेवास्मि वक्तुं शक्रोमि नेतरत् ॥ ४८ ॥
तरङ्गतरलापाङ्गे गुरुस्त्वं मे नमोऽस्तु ते ।
प्रसादेन विशालाक्ष्यास्तीर्णोऽस्मि भवसागरात् ॥ ४९ ॥
पुनर्मलं न गृह्णामि शतध्मातसुवर्णवत् ।
शान्तः स्वस्थो मृदुर्यत्तो वीतरागो निरंशधीः ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
निरीह और कृतकृत्य तुम्हारा प्रत्युपकार करने में मैं असमर्थ हूँ, यों राजा कहते हैं।
सब प्रकार की इच्छाओं से रहित और संसाररूपी महान् दुस्तर सागर से पार हो चुकी तुम्हारे लिए
इस महान् उपकार का प्रत्युपकार किस तरह मैं कर सकूँगा ? हे प्रिये, तुम्हें मैं कुलांगना मानता हूँ, इस
लोक में लोकप्रसिद्ध जितनी कुलांगनाएँ हैं, उनके ऊपर इस समय तुमने विजय पा ली । अबसे स्त्रियों
के सौजन्य की जब प्रशंसा होगी, तब तुम्हारी ही सर्वप्रथम गणना होगी । हे मानिनि, अपनी अपेक्षा
उत्तम गुणों में बढ़ जानेवाली तुम्हारी रचना करनेवाले ब्रह्माजी के ऊपर निश्चय ही अरुन्धती आदि
स्त्रयो करुद्ध होती होंगी, यह मैं मानता हूँ रूप, सोजन्य ओर उत्तमोत्तम गुणरूपी रत्नों की निधिभूत हे
चूडाले, तुम सती (पतिव्रता) हो, आओ, तुम्हारे गुणों से उत्साहित हुए मेरा तुम फिर आलिंगन करो |
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामभद्र, उस प्रकार कहकर राजा शिखिध्वज ने - मृग के बच्चे के
सदृश विशाल नेत्रवाली उस चूडाला का - फिर गाढ़ ऐसे आलिंगन किया, जैसे नेवले का नेवली ।
चूडाला ने कहा : हे देव, शुष्क क्रियाओं के चक्कर मेँ निरत और व्याकुलमति आपको बार-बार देखकर
मैं अत्यन्त दुःखित होती थी । इसलिए हे देव, आपको तत्त्वज्ञान देकर मैंने वह अपना स्वार्थ ही सिद्ध
किया है। इस विषय में आप मेरा गौरव व्यर्थ ही बढ़ा रहे हैं। राजा शिखिध्वज ने कहा : हे वरारोहे, तुम
जिस तरह से शुभ स्वार्थ सिद्ध कर रही हो, उसी तरह से अब सभी कुलीन स्वरयो स्वार्थ सिद्ध करें, यह
मैं चाहता हूँ । चूडाला ने कहा : हे कान्त, हे विभो, अब आप इस जगत्-रूपी जाल के एकदम किनारेपर
आकर विश्रान्त हो गये हैं। आज अपना वह पयोव्रत, उपवास आदि पहले का तुच्छ मोह क्या आप देख
रहे हैं यह करूँ, यह न करूँ, यह प्राप्त करूँ - इस तरही बुद्धि की अपक्वदशाजनित कोमलतारूप
जो स्थिति थी , उसके प्रति क्या आप अपने मन में अब हँसते हैं कि नहीं । हे देव, जैसे आकाश में पर्वत
नहीं दिखाई देते, वैसे अब आप में वे पहले की तुच्छ तृष्णाओं के संग्रह ओर तुच्छ संकल्परूपी कल्पनाएँ
नहीं दिखाई देतीं | प्रिय आज आप किसके स्वरूप बन गये हैं, किस वस्तु में आपकी निष्ठा है, आप क्या
चाहते हैं। हे विभो, आप पहले की शारीरिक चेष्टाओं को सत्य देखते हैं या असत्य (तुच्छ) देखते हैं ?
राजा शिखिध्वज ने कहा : सुमनों से (फूलों से) पूर्ण नीलकमलमाला का अनुसरण करनेवाले नेत्रों से
सुशोभित हे चूडाले, मेरे आत्मस्वरूपभूत हुई तुम जिस-जिसके अन्दर (मोह, विवेक, तत्त्वज्ञान आदि
के अन्दर) प्रकाशकरूप से विद्यमान हो; उस-उसके अन्दर मैं भी प्रकाशकरूप से विद्यमान हूँ, इसलिए
अब तुम जिस तरह देखती हो, वैसे ही मैं भी देखता हूँ, अपने अनुभव से ही तुम्हें मेरी निष्ठा जान लेनी
चाहिए