Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
पुनःपुनरिदं राम प्रबोधार्थं मयोच्यते ।
अभ्यासेन विना साधो नाभ्युदेत्यात्मभावना ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
उत्साह उत्पन्न करने के लिए उद्घाटन कर रहे महाराज श्रीवसिष्ठजी अविद्याक्षय होने पर परिशिष्टरूप
से रहनेवाली दृष्टि का श्रवण करने के लिए श्रीरामजी को सावधान करते है।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामभद्र, आत्मस्वरूप के उत्तम परिज्ञान के लिए मैं बार-बार
इस रहस्य का आपसे कथन (उद्घाटन) करता हूँ, क्योकि हे साधो, अभ्यास के विना आत्मभावना
कभी उदित नहीं होती