Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
ब्रह्म कालत्रयं तच्च ब्रह्मण्येव व्यवस्थितम् ।
तरङ्गमालयाम्भोधिर्यथात्मनि विवर्धते ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे समुद्र तरंगों की परम्पराओं से अपने स्वरूप में बढता है, वैसे ही अनैकविध पदार्थलक्षिमयों से
यह ब्रह्म इस प्रकार बढ़ता है