Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
ब्रह्म ब्रह्मणि बृंहाभिर्ब्रह्मशक्त्येव बृंहति ।
ब्रह्म मच्छत्रुरूपं मे ब्रह्मणोऽप्रियकृद्यदि ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
इस दृष्टि से कहीं राग, द्वेष आदि की प्रसक्ति नहीं होती, इस आशय से कहते है ।
ब्रह्मस्वरूप मेरा अनिष्ट करनेवाले मेरे शत्रु का स्वरूप यदि ब्रह्म ही है, तो ब्रह्मनिष्ठ के प्रति किसी
के द्वारा ब्रह्म में किया हुआ ब्रह्म को छोड ओर क्या हो सकता हे २