Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
त्वत्तामत्ते तथा न स्तो ब्रह्मणि स्पन्दरूपिणि ।
यथावर्तमृते तोये न किंचिन्म्रियते क्वचित् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे आवर्त के नष्ट होने पर जल में कुछ भी नष्ट नहीं होता, वैसे ही देहात्मक ब्रह्म में मरणरूप ब्रह्म के
प्राप्त होने पर कुछ भी नहीं मरता