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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

सबाह्याभ्यन्तरं सर्वैरिन्द्रियैरनुभूयते । भावाभावेषु देहस्य तेनातिघनतां गतम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

बाह्य ओर आभ्यन्तर चक्षु आदि अत्यन्त बलिष्ठ अनेक प्रमाणो से गृहीत होनेवाले द्वैत से अभिन्न होने के कारण भी अज्ञान की प्रबलता है, यह कहते है। देह की सत्तादशा में (जीवन, जाग्रत आदि अवस्थाओं में) समस्त इन्द्रियों से तथा देह के अभाव में (मरण, प्रलय आदि अवस्थाओं मेँ) साक्षी से बाह्य ओर आभ्यन्तर सदा उस अज्ञान का अनुभव किया जाता है, अतः उसने अत्यन्त घनीभूत स्थिति (प्रबलता) प्राप्त कर ली है