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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

तथा जडाजडे रूपे न स्थिते परमात्मनि । कटकत्वं यथा हेम्नो यथावर्तो जलस्य च ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

जिस प्रकार सुवर्ण में कटकरूपत्व और जल में आवर्तरूपत्व का होना सुवर्ण और जल का एक स्वभाव है, उसी प्रकार जड़अजड़रूप होना यह ब्रह्म का भी एक मायिक स्वभाव है