Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verses 79–84
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verses 79–84 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 79
संस्कृत श्लोक
शक्तिरुद्गमनीयान्तस्तच्चिद्ब्रह्माहमाततम् ।
खर्जूरनिम्बबिम्बानां स्वयमात्मनि तिष्ठताम् ॥ ७९ ॥
या स्वादसत्ता लीनान्तस्तद्ब्रह्म चिदहं समः ।
खेदानन्दविमुक्तान्तः संवित्तिर्मननोदया ॥ ८० ॥
लाभालाभविधौ तुल्या चिद्ब्रह्मास्मि निरामयम् ।
यावद्भूम्यर्कमेतावद्दृष्टिसूत्रं यदाततम् ॥ ८१ ॥
तन्मध्यसदृशं शान्तं निर्मलं चिदहं ततम् ।
जाग्रत्यपि सुषुप्तेऽपि तत्स्वप्नेऽपि तथोदितम् ॥ ८२ ॥
तुर्यं रूपमनाद्यन्तं चिद्ब्रह्माहमनामयम् ।
पुंसां क्षेत्रशतोत्थानामिक्षूणां स्वादुवत्स्थितम् ॥ ८३ ॥
सर्वेषामेकरूपं तच्चिद्ब्रह्मास्मि समः स्थितः ।
सर्वगा प्रकृता स्वच्छरूपा भानोरिव प्रभा ॥ ८४ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वयं अपने जडस्वभाव में अवस्थित
खजूर, निम्ब ओर बिम्ब आदि फलों के रसविशेषों में भीतर विद्यमान रसनावृत्ति से अभिव्यक्त हुई
प्रकाशस्वरूप जो स्वाद-सत्ता है, वह चिदात्मक ब्रह्म है, वही मैं हू