Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 111, Verses 40–41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 111, verses 40–41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 111 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
दिक्कालाद्यनवच्छिन्नं स्वच्छं नित्योदितं ततम् ।
सर्वार्थमयमेकार्थचिन्मात्रममलं भवान् ॥ ४० ॥
फलकुसुमदलानां सर्वदिक्संस्थितानां रस इव जगतां त्वं संस्थितः सर्वदैव ।
विमलतरचिदात्मा नित्यमेवास्यनन्तः क इव कच तवाहंनिश्चयो भावमूर्तेः ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
तब मैं कौन हूँ ?
देश, काल आदि परिच्छेदों से शून्य, स्वच्छ, निरन्तर उदयस्वभाव, व्यापक सब पदार्थों के रूप से
भासमान, निर्मल अद्बय चिन्मात्रस्वरूप तुम हो