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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 114, Verses 14–21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 114, verses 14–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 114 · श्लोक 14-21

संस्कृत श्लोक

नानातामखिलां त्यक्त्वा शुद्धचिन्मात्रकोटरे । संवेद्येन विनिर्मुक्ते संवित्तत्त्वे स्थितो भव ॥ १४ ॥ स्वयमेवात्मनैवात्मा शक्तिं संकल्पनामिकाम् । यदा करोति स्फुरता स्पन्दशक्तिमिवानिलः ॥ १५ ॥ तदा पृथगिवाभासं संकल्पकलनामयम् । मनो भवति विश्वात्मा भावयन्स्वाकृतिं स्वयम् ॥ १६ ॥ तत्संकल्पात्मकं चेतो यथेदमखिलं जगत् । संकल्पयति संकल्पैस्तथैव भवति क्षणात् ॥ १७ ॥ कीटत्वमब्जजत्वं च मेरुत्वं मरुतां तथा । मनो जीवमहंकारबुद्धिचित्तादिनामकम् ॥ १८ ॥ संकल्पतो द्वितैकत्वमेत्य चेतो जगत्स्थितिम् । तनोति तस्यां तदनु नानातां गच्छति स्वयम् ॥ १९ ॥ संकल्पमयमेवेदं जगदाभोगि दृश्यते । न सत्यं न च मिथ्यैव स्वप्नजालमिवोत्थितम् ॥ २० ॥ जन्तोर्यथा मनोराज्यं विविधारम्भभासुरम् । ब्राह्मं तथेदं विततं मनोराज्यं विराजते ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

दृष्टान्त मेँ जो विकल्पत्याग की शैली युक्तिपूर्वक सिद्ध की गई है, उसका दाष्टन्ति में उपदेश देते हैं । हे रामभद्र, सम्पूर्ण नानारूपता का (द्वैतभाव का) परित्याग कर विषय-सम्बन्ध से निर्मुक्त चेतनतत्त्वभूत विशुद्ध चिन्मात्र जो भीतर का आत्मतत्त्व है उसमें स्थित हो जाइये । स्वप्रकाश स्वयमात्मा ही अपने-आप जब, स्पन्दनशक्ति को वायु के सदृश, संकल्पनात्मक शक्ति को उत्पन्न करता है तब भिन्न की तरह भासनेवाला संकल्पकलनात्मक मनरूप हो जाता है ओर विश्वाकार अपनी आकृति की भावना कर रहा वह समष्टि मन बन जाता हे । वह विश्वाकार संकल्परूप समष्टिचित्त इस जगत्‌ की जिस रूप से कल्पना करता है तत्क्षण ही संकल्पो से उस रूप का हो जाता हे । वही मन कीटरूप, ब्रह्मरूप, सुमेरुरूप एवं मरुभूमिरूप हो जाता है, उसीके जीव, अहंकार, बुद्धि, चित्त आदि नाम हँ । वही चित्त संकल्प से द्वित्व ओर एकत्व प्राप्त कर जगत्‌ की व्यवस्था बनाता है और उसके बाद उसीमें नानारूप स्वयं हो जाता है । यह जो जगद्रूप विशाल आकार देखा जाता है, वह सब मन का संकल्प ही है, वह न सत्य है और न असत्य ही है, किन्तु स्वप्नो के सदृश अनिर्वचनीय ही उत्पन्न हुआ हे । जैसे साधारण प्राणी का मनोराज्य विविध सामग्री रचनाओं से सुन्दर है, वैसे ही हिरण्यगर्भ का भी यह व्यापक मनोराज्य सुन्दर है