Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 117, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 117, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
एकं यथा स्फुरति वारि तरङ्गभङ्गैरेवं परिस्फुरति चिन्न च किंचिदेव ।
त्वं बन्धमोक्षकलने प्रविमुच्य दूरे स्वस्थो भवाऽभवभयोऽभयसार एव ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
मिथ्याभूत उपाधियों भ्रान्ति के कारण चिदाभासो की कल्पना की गयी है, वस्तुतः उनकी प्रसक्ति
नहीं है, इसको कहते है।
इस संसार में न तो किसीका बन्ध है और न मोक्ष है, केवल एकमात्र सब विकारों से शून्य ब्रह्म ही
है। इसमें न तो एेक्य है और न द्वित्व ही है, केवल संवित्सार ही विलसित हो रहा हे ।।१४॥
उक्त द्वितीय प्रश्न के उत्तर का उपसंहार करते हैं।
जैसे एक जल तरंगभेदों से स्फुरित होता है वैसे ही चिद्रूप ब्रह्म भी जगत् के नानाभेदों से स्फुरित
होता है और वह मायामात्र होने से कुछ भी नहीं है, इसलिए हे राजन् बन्ध और मोक्ष के भ्रम को दूर
फेंककर जिसको संसार का भय है ही नहीं, ऐसा तुम अभयरूप ब्रह्मसार ही हो जाओ