Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 118, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 118, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
ते जीवाः संसरन्तीह संसारे पूर्वमुत्थिते ।
सुखदुःखदशामोहो मनस्येवास्ति नात्मनि ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
उपाधिरूप से आविर्भूत हुए इस संसार में (समष्टि और व्यष्टिरूप
मन के कार्य में) वे जीव चक्कर काटते-फिरते हैं । यदि सचमुच पूछा जाय तो सुख-दुःख की दशाओं
का मोह मन में रहता है, आत्मा में नहीं