Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 12, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 12, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
प्राकृताचारसंप्राप्ते कुर्वन्तः कर्म केवलम् ।
स्थिता विगतसंरम्भमपरा इव मेरवः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
अपने-अपने वर्णाश्रमो के अनुकूल सदाचार से प्राप्त विषयों मेँ केवल कर्म करते हुए क्रोधरहित
होकर मानों दूसरे मेरुपर्वत की नाई स्थित रहते थे