Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 12, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 12, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
यथाभूतामिमामेव पश्यत्सर्गपरम्पराम् ।
मेरुस्थितोऽब्धिगम्भीरः सममास्स्व गतभ्रमः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, इसी सृष्टि की परम्परा को यथास्थित दृष्टि से देखते हुए आप मेरुपर्वत की तरह
स्थिर, समुद्र की तरह गंभीर एवं भ्रमशून्य होकर समतापूर्वक स्थिर रहिए