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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 123, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 123, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 123 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

एष एव विशेषोऽस्य न समो मूढबुद्धिभिः । सर्वत्रास्थापरित्यागान्नीरागममलं मनः । भवेत्तस्य महाबुद्धेर्नासौ वस्तुषु मज्जति ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

तव तत्त्ववेत्ता पुरुष में सिद्धो की अपेक्षा विशेष क्या है, इस प्रश्न पर कहते हैं। यही इसमें विशेष है कि वह मूढ़बुद्धि पुरुषों के समान नहीं रहता यानी तत्त्वज्ञान ही इसमें विशेष हे । इस प्रसिद्ध महाबुद्धि का मन सर्वत्र बाह्य वस्तुओं मेँ आसक्ति के परित्याग से निरन्तर रागशून्य तथा निर्मल ही बना रहता है ओर वह ज्ञानी पुरुष कभी भी भोग्य विषयों में नहीं फँसता