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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 124, Verses 1–2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 124, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 124 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । यथा सत्त्वमुपेक्ष्य स्वं शनैर्विप्रो दुरीहया । अङ्गीकरोति शूद्रत्वं तथा जीवत्वमीश्वरः ॥ १ ॥ भूतानि द्विविधान्येव प्रतिसर्गे स्फुरन्ति वै । आद्यविस्पन्दजातानि तानि निष्कारणानि वै ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

दूसरी सिद्धिर्यो की अपेक्षा आत्मज्ञान का उत्कर्षं इसलिए है कि वह नित्य निरतिशयानन्दानुभवरूप है और प्रत्यगात्मा की निरतिशयानन्दरूपता इसलिए है कि वह ब्रह्मरूप है, इस बात को युक्तिपूर्वक सिद्ध करने के लिए ब्रह्म ही अपने स्वरूप की उपेक्षा से जीवरूप को प्राप्त करता है, यह कहते है। महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे रामभद्र, जैसे कोई ब्राह्मण अपने स्वभावसिद्ध सात्विक ब्राह्मणधर्म का धीरे-धीरे उल्लंघन कर दीर्घकाल के बाद नीच स्त्री की नीचरूपता का अंगीकार करता हे वैसे ही परब्रह्म परमात्मा भी बुद्धि आदि के संग से बुद्धिजनित भोग की इच्छा से अपने नित्यसिद्ध पूर्णानन्द स्वभाव का उल्लंघन कर जीवरूपता का अंगीकार करता हे । प्रत्येक सृष्टि में दो तरह के (उपाधि की प्रधानता से भोग्य ओर उपहित की प्रधानता से भोक्ता - यों दो तरह के) पदार्थ आविर्भूत होते हैं । वे दोनों तरह के पदार्थ माया में रहनेवाले अनादि दो तरह की संस्कार परम्परा का अनुसरण कर रहे हिरण्यगर्भ के प्रथम स्पन्द से उत्पन्न होते हैं ओर मिथ्यारूप होने के कारण वे किसी प्रकार की असली सामग्री की अपेक्षा नहीं करते | ठीक ही है कि स्वप्न के घट आदि पदार्थ दण्ड, चक्र आदि अपनी उत्पत्ति में सामग्री की अपेक्षा नहीं रखते

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ तेईसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ चौबीसवाँ सर्ग॑ जीवों की निष्कारणता, राग से बद्धता तथा अवस्था आदि का वर्णन ।