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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 125, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 125, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 125 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । सिद्धान्तोऽध्यात्मशास्त्राणां सर्वापह्नव एव हि । नाविद्यास्तीह नो माया शान्तं ब्रह्मेदमक्रमम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

एक सौ चौबीसवाँ सर्गं समाप्त एक सौ पचीसवाँ सर्ग द्वैत के अपलापरूप तथा सिद्धान्तभूत तुर्यपद में, जहाँ सभी वादियों को भ्रम होता है, स्थिरता का उपायपूर्वक वर्णन । आत्मा को ले करके प्रवृत्त हुए श्रुति, स्मृति, इतिहास, पुराण आदि समस्त शास्त्रों का परम सिद्धान्त सम्पूर्ण द्वैत का अपलाप करना ही है, वह द्वैत चाहे जीव का अविद्या के साथ अवस्थात्रयरूप हो, चाहे ईश्वर का माया के साथ आकाश आदि प्रपंचरूप हो, न कि उनका सिद्धान्त वस्तुतत्त्व को प्रकाशित करना है, क्योकि स्वप्रकाशस्वरूप आत्मवस्तु के स्वतःसिद्ध होने से उसकी सिद्धि के लिए किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता ही नहीं है, यही कहते हैं। महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे राघव, समस्त द्वैत का अपलाप करना ही सकल अध्यात्म शास्त्रों का परम सिद्धान्त है। यहाँ न तो अविद्या है और न माया ही है, किन्तु शास्त्रों से (७) जिसका परिज्ञान नहीं हो सकता, ऐसा सम्पूर्ण उपद्रवों से रहित नित्य अपरोक्ष ब्रह्म ही है