Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verses 57–61
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 126, verses 57–61 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 57-61
संस्कृत श्लोक
आर्यतायां मृतो योगी शुभसंकल्पसंभृतान् ।
भोगान्भुक्त्वा चिरं कालं योगवाञ्जायते पुनः ॥ ५७ ॥
भूमिकात्रितयाभ्यासादज्ञाने क्षयमागते ।
सम्यग्ज्ञानोदये चित्ते पूर्णचन्द्रोदयोपमे ॥ ५८ ॥
निर्विभागमनाद्यन्तं योगिनो युक्तचेतसः ।
समं सर्वं प्रपश्यन्ति चतुर्थी भूमिकामिताः ॥ ५९ ॥
अद्वैते स्थैर्यमायाते द्वैते प्रशममागते ।
पश्यन्ति स्वप्नवल्लोकांश्चतुर्थीं भूमिकामिताः ॥ ६० ॥
भूमिकात्रितयं जाग्रच्चतुर्थी स्वप्न उच्यते ।
विच्छिन्नशरदभ्रांशविलयं प्रविलीयते ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तीसरी भूमिका की प्राप्ति के बीच में ही मृत्यु को प्राप्त कर चुके निष्काम कर्मो के अनुष्ठान से
पापशून्य हुए योगियों को कर्मणा पितृलोकः विद्याया देवलोकः“ इत्यादि श्रुतियों मे बतलाया गया उपभोग
भी देवलोक आदि में करना पड़ता है, परंतु यह भोग शुभ संकल्पो से उत्पन्न सव वासनाओं से युक्त
होने के कारण, काम्यकर्म का अनुष्ठान करनेवाले पुरुषों की नाई, रागादि दुर्वासनाओं के द्वारा अधःपतन
का हेतु नहीं होता, इसी आशय से कहते हैं।
इस तीसरी भूमिका की प्राप्ति के बीच में ही मृत्यु को प्राप्त हुआ योगी पुरुष शुभ संकल्पजनित
उत्तम वासनायुक्त भोगों का चिरकाल तक उपभोग कर पुनः योगी ही होता है। तीन भूमिकाओं का
अभ्यास करने से अज्ञान के नष्ट हो जाने पर सम्यकृज्ञान का उदय होने के बाद जब पूर्णचन्द्रोदय के
सदृश चित्त हो जाता है तब चौथी भूमिका में पहुँचे हुए युक्तचित्त योगी लोग सम्पूर्ण जगत् को
विभागशून्य आदि और अन्त से रहित आनन्दैकरस देखते हैं । द्वैत के बिलकुल शान्त हो जाने पर
जब अद्वैत स्थिर हो जाता है तब चौथी भूमिका में गये हुए योगी लोग सब लोकों को स्वप्न के समान
देखने लगते हैं । तीन भूमिकाओं को जाग्रत् कहते हैं, क्योंकि जैसे जाग्रत् में व्यावहारिक सत्ता से
जगत् का भान होता है, वैसे ही इनमें भी व्यावहारिक सत्ता से जगत् का भान होता है और चौथी
भूमिका को स्वप्न कहते हैं, क्योकि जैसे स्वप्न में प्रातिभासिक सत्ता से जगत् का भान होता है, वैसे
ही इसमें भी भान प्रातिभासिक सत्ता से ही होता है (पंचम भूमिका के लिए सुषुप्तिपद का प्रयोग होने
में कारणभूत सुषुप्ति का सादृश्य बतलाते हैं ) शरत्काल में विच्छिन्न मेघ के विलीन हो जाने पर
जैसे केवल शुभ्र आकाशरूप बच जाता है वैसे ही पंचम भूमिका में सम्पूर्ण व्यापारों के विलीन हो
जाने पर केवल शुद्ध चिन्मात्र ही बच जाता है। एवं, पंचम भूमिका के लिए जो सुषुप्ति शब्द का प्रयोग
आता है इसमें कारण यही है कि सुषुप्तिकाल में जैसे समस्त व्यावहारिक भान विलीन हो जाते हैँ,
वैसे ही इस पंचम भूमिका में व्यावहारिक और अवशिष्ट प्रातिभासिक त्रिपुटीभान भी विलीन हो जाते
हैं, अतः पंचम भूमिका एक तरह से सुषुप्ति के सदृश ही ठहरी, इसलिए सुषुप्ति और पंचम भूमिका में
समानता होने से पंचम भूमिका के लिए सुषुप्ति शब्द का प्रयोग यत्र-तत्र श्रुति आदि में किया गया है,
यह निष्कर्ष हे