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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 126, Verses 70–73

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 126, verses 70–73 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 70-73

संस्कृत श्लोक

षष्ठ्यां भूम्यामसौ स्थित्वा सप्तमीं भूमिमाप्नुयात् । विदेहमुक्तता तूक्ता सप्तमी योगभूमिका ॥ ७० ॥ अगम्या वचसां शान्ता सा सीमा भवभूमिषु । कैश्चित्सा शिवमित्युक्ता कैश्चिद्ब्रह्मेत्युदाहृता ॥ ७१ ॥ कैश्चित्प्रकृतिपुंभावविवेक इति भाविता । अन्यैरप्यन्यथा नानाभेदैरात्मविकल्पितैः ॥ ७२ ॥ नित्यमव्यपदेश्यापि कथंचिदुपदिश्यते । सप्तैता भूमिकाः प्रोक्ता मया तव रघूद्वह ॥ ७३ ॥

हिन्दी अर्थ

छठी भूमिका का लक्षण बतलाते हैं। जहाँ पर न तो सत्‌, न असत्‌, न अहंकार और न अहंकार का अभाव ही रहता है, किंतु क्षीण मनन होने के कारण यानी निर्विकल्प होने के कारण योगी केवल द्वैत और अद्वित से शून्य ही रहता है। अहंकाररूप गोठ के (८) विच्छिन्न हो जाने से उस योगी के सभी सन्देह नष्ट हो जाते हैं और वासनाओं से शून्य जीवन्मुक्त वह योगी निर्वाण को न प्राप्त हुआ भी (देह धारण कर रहा भी) अहंकार और (८) इसमें "भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः” (उसके हृदय की गाँठ टूट जाती है और सब सन्देह दूर हो जाते हैं । यह श्रुति प्रमाण है । वासनाओं से शून्य होने के कारण निर्वाण को प्राप्त हुआ, चित्रलिखित दीप की नाई, स्थित रहता है। जीवन्मुक्त वह योगी जड़ जगत्‌ के स्वभाव से बाहर और भीतर से शून्य, आकाश में शून्य घट की नाई, स्थित रहता है तथा आनन्दपरिपूर्ण स्वभाव होने के कारण बाहर और भीतर से पूर्ण होकर, सागर में परिपूर्ण घट के समान, स्थित रहता हे । उसके अद्वितीय रूप की संसार-दशा में कभी प्रसिद्धि न होने से वह किसी उत्तम आश्चर्यमय अपूर्व रूप से सम्पन्न रहता है अथवा वास्तविक दृष्टि से तो वह किसी भी रूप से कुछ भी सम्पन्न न हुआ रहता है। छठी भूमिका में स्थित होकर वह योगी सातवीं भूमिका में पहुँचता है ॥६ ६-६९॥ सातवीं योगभूमिका विदेहमुक्तता कही गयी है । वह शान्तस्वरूप, वाणी का अगम्य (७) और संसार की भूमिकाओं की सीमा हे । कोई लोग (शेव लोग) उसे शिव कहते हैं, कोई लोग (वेदान्ती) उसे ब्रह्म कहते हैं और कोई लोग (सांख्य, योगी) उसे प्रकृति से पुरुष का विवेक कहते हैं। इस तरह भिन्न-भिन्न लोगों ने अपनी बुद्धि के अनुसार कल्पित रूपों से सप्तम भूमिका की भावना की है। यद्यपि यह भूमिका सर्वथा उपदेश योग्य नहीं है, तथापि किसी तरह इसका उपदेश किया जाता है। हे श्रीरामचन्द्रजी, ये सातों भूमिकाएँ मैने आपसे कह दीं । इनके अभ्यासयोग से मनुष्य दुःख का अनुभव नहीं करता