Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 127, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
अविद्यायाः प्रपञ्चोऽयं नास्ति सत्यमिहाण्वपि ।
विवेचयन्ति विबुधा विवदन्त्यविवेकिनः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
चूँकि यह सारा प्रपंच मिथ्याभूत अविद्या से उत्पन्न हुआ है, इसलिए प्रपंच झूठा है और आखिर में
चैतन्यरूप अद्वैत तत्त्व का ही राज रहता है, यह बुद्धिमान् मनुष्य अनायास जान सकता है, यह कहते हैं ।
भद्र, यह जो यहाँ अविद्या का प्रपंच है, वह तनिक भी सत्य नहीं है यानी समस्त संसाररूप प्रपंच
एकदम मिथ्या ही है। उसमें अधिष्ठानभूत जो तत्त्व है, उसको अलग कर पण्डित लोग निकाल लेते हैं
शब्द का अर्थ समझना चाहिए । मन्त्रशास्त्र मेँ शक्तिपात शब्द का अर्थ वर्णित है - गुरुजी की शिष्य
के ऊपर जब अत्यन्त दया हो जाती है, तब वे अपनी देह छोड़कर शिष्य की देह में प्रवेश कर जाते
है, तदनन्तर शिष्यदेह की प्रत्येक नाड़ी का शोधन कर उसकी कुण्डलिनी मेँ सप्तचक्रों में संचारण
द्वारा समस्त भुवनों का वृत्तान्त प्रत्यक्ष दिखलाते हैं, यह दिखलाना ही शक्तिपात है । परंतु इस
मन्त्रशास्त्रवर्णित अर्थ का यहाँ ग्रहण करना अभीष्ट नहीं है; क्योकि श्रीरामभद्र स्वयं ही ईश्वर हैं,
अतः उनमें सर्वज्ञत्व आदि धर्म स्वतः सिद्ध हैं, इसलिए इन धर्मो की श्रीरामभद्र को न तो कोई
आवश्यकता है ओर न उससे लोकोपकार की सिद्धि ही है।
ओर अपण्डित लोग उस मिथ्या संसार को लेकर परस्पर कलह करते हैं