Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verses 32–38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 127, verses 32–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 32-38
संस्कृत श्लोक
असतः संभवो नास्ति नास्त्वभावः सतः सखे ।
आविर्भावतिरोभावाः संस्थानानाममी परम् ॥ ३२ ॥
किंत्वनेकपुरोत्साहाद्विषतामुपगच्छति ।
भज संभरिताभोगं परमेशं जगद्गुरुम् ॥ ३३ ॥
दुरितानि समस्तानि पच्यन्तेऽद्यापि न ध्रुवम् ।
कृतमेवास्य देवस्य पाशा विश्रवतां गताः ॥ ३४ ॥
साकारं भज तावत्त्वं यावत्सत्त्वं प्रसीदति ।
निराकारे परे तत्त्वे ततः स्थितिरकृत्रिमा ॥ ३५ ॥
इमामुद्दामतमसो जित्वा सत्त्वबलाद्ध्रुवम् ।
यमस्यानुसराध्वानं विश्वस्तेनान्तरात्मना ॥ ३६ ॥
समाधाय क्षणं पश्य प्रत्यगात्मानमात्मना ।
इयं विभातु सा व्यक्तं प्राग्बुद्धिरजनी तव ॥ ३७ ॥
कृतं पुरुषकारेण केवलेन च कर्मणा ।
महेशानुग्रहादेव प्राप्तव्यं प्राप्यते नरैः ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
अपनी प्रिय वस्तु के नाश से प्राणी को शोक अवश्य होता है। यदि वह प्रिय वस्तु सद्रूप है, तव तो
वह कभी नष्ट नहीं हो सकती और यदि असरूप है, तो वह कदापि स्थित नहीं रह सकती, इस तरह
दोनों प्रकारों से उस आत्म-वस्तु के नाश की किसी तरह भी सिद्धि न होने के कारण शोक का कोई हेतु
है ही नहीं, इस आशय से कहते हैं।
हे मित्र, न तो असद्वस्तु की उत्पत्ति होती है और न सद्वस्तु का अभाव होता है, केवल माया द्वारा
विरचित चित्र-विचित्र रचनाओं के ये आविर्भाव और तिरोभाव होते रहते हें । यदि देहादि रचनाविशेष
मायिक हे, तो फिर ऐन्द्रजालिक द्वारा दिखाई गयी माया की नाई इसे उदासीन ओर तटस्थ अवभासित
होना चाहिए, शोक, मोह आदि दुःखों से भरे हुए हजारों अनर्थ उत्पन्न करने में इसके पास विशेष हेतु
क्या है, यदि ऐसी तुम आशंका करो, तो उस पर हम कहते हैं, सुनो । हे मित्र, यह तुम्हारी आशंका
सत्य है, आधुनिक कोई हेतु इसके पास उपस्थित नहीं है, किंतु पुण्य और पाप में प्रवृत्ति रूप जो
अनेक पूर्व जन्मों का संचित पुरुषप्रयत्न है वही पुण्य-पापनामक विशेष हेतु इसके पास उपस्थित हे ।
उसी से वह मायिक देह आदि पुष्यादि-फल के भोग के लिए विष के समान मरण-मूर्च्छा आदि हजारों
हेतुओं के स्वरूप में परिणत हो जाता है ओर सैकड़ों बार उपदेश देने पर भी अध्यात्मज्ञान के प्रतिपादक
शास्त्रों का अर्थ पाप के कारण इसके हृदय में स्थान नहीं कर पाता, इसलिए हे मित्र, उस पाप के
विनाश के लिए अपने भक्तों के ऊपर अनुग्रह करने के वास्ते अर्धनारीश्वर आदि का वेष धारण किये
हुए जगद्गुरु सगुण परमेश्वर की तुम उपासना करो हे मित्र, अभी तक तुम्हारे समस्त पाप नष्ट नहीं
हो गये है । प्राणियों द्वारा किये गये पुण्य-पापरूपी कर्म ही इस पशुपति भगवान् के प्राणीरूपी पशुओं
के बंधन के लिए पाशरूप से विविध श्रुति आदि प्रमाणो के द्वारा प्रसिद्धि को प्राप्त कर चुके हैं । हे सखे,
तुम तब तक साकार ()) देव का भजन करो, जब तक तुम्हारा चित्त विशुद्ध नहीं हो जाता, क्योकि
उस भजन से विघ्नो द्वारा किसी तरह की बाधा न पहुँचाये जाने के कारण निराकार परमतत्त्व में तुम्हारी
सहज स्थिति दृढ़ हो जायेगी । साकार महेश्वर की उपासना से प्राप्त विशुद्ध सत्त्व के बल से हजारों
विविध व्यामोहो के द्वारा प्रचण्ड बने अज्ञान की इस व्यामोह-शक्ति को जीतकर गुरु और शास्त्रों के
उपदेश में विश्वासयुक्त मन से इन्द्रियों के साथ-साथ मनोनिग्रहरूप योग के मार्ग का अनुसरण करो।
अनन्तर क्षणभर की समाधि लगाकर अपने से ही प्रत्यगात्मा का अवलोकन करो, ताकि उस प्रत्यगात्मा
के दर्शन से तमोगुण से आच्छादित तुम्हारी बुद्धिरूपी रात प्रभातरूप मेँ परिणत हो जाय | केवल पुरुष
प्रयत्नरूप कर्मो से कोई मतलब सिद्ध नहीं होता, भगवान् महेश्वर के एकमात्र अनुग्रह से ही मनुष्य
प्राप्तव्य वस्तु की प्राप्ति कर लेते है