Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 127, Verses 7–9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 127, verses 7–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 7-9
संस्कृत श्लोक
न किंचिदूचे संपन्नः शिवे परिणतः पदे ।
भरद्वाज उवाच ।
अहो खलु ममाश्चर्यं रामः प्राप्तो महत्पदम् ॥ ७ ॥
कथमेतादृशी प्राप्तिरस्माकं मुनिनायक ।
मूर्खाः स्तब्धाश्च किंचिज्ज्ञा मादृशाः क्व च पापिनः ।
क्व च ब्रह्मादिभिः प्रार्थ्या दुर्लभा रामसंस्थितिः ॥ ८ ॥
अहो मुनीश्वरगुरो कथं विश्राम्यते मया ।
दुष्पारस्य भवाम्भोधेस्तीर्यते तद्वदाशु मे ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार उत्तम अधिकारी श्रीरामचन्द्रजी को ज्ञान की प्राप्ति हुई, यह वर्णन कर अव मन्द,
मध्यम अधिकारियों को चित्तशुद्धि के लिए विशिष्ट उपासना ओर मनन के उपायभूत तीन अवस्थाओं
के विवेक एवं दृश्य प्रपंच के विवेक आदि कहने के लिए उनका उपक्रम करने में हेतु भरद्वाज की उत्कण्ठा
आदि का वाल्मीकिजी वर्णन करते हैँ ।
भरद्वाज ने कहा : हे मुनियों के नायक, अहो, मैं आश्चर्यचकित हूँ कि श्रीरामभद्र तो, महान् आत्मपद
प्राप्त कर चुके, परंतु हम लोगों को उस तरह के आत्मपद की प्राप्ति कैसे होगी । मेरे जैसे मूर्ख, स्तब्ध,
अल्पज्ञ पापी कहाँ ओर ब्रह्मा आदि द्वारा चाही जा रही दुर्लभ रामजी की स्थिति कहाँ ? हे बड़े-बड़े
मुनियों के गुरो, अहो, मैं किस तरह आत्मपद में विश्रान्ति पा सर्वगा ओर इस दुस्तर संसाररूपी महासागर
के मोहरूपी जल से पार किस तरह हो सर्वगा, यह शीघ्र मुझसे कहिए