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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verses 104–106

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 128, verses 104–106 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 104-106

संस्कृत श्लोक

इत्युक्त्वा चरणौ तस्य वसिष्ठस्य महात्मनः । शिरसा धार्य सर्वात्मा सर्वान्प्राह घृणानिधिः ॥ १०४ ॥ श्रीराम उवाच । सर्वे श्रृणुत भद्रं वो निश्चयेन सुनिश्चितम् । आत्मज्ञानात्परं नास्ति गुरोरपि च तद्विदः ॥ १०५ ॥ सिद्धादय ऊचुः । रामैवमेव सर्वेषां मनसि स्थितिमागतम् । त्वत्प्रसादाच्च सकलं संवादेन दृढीकृतम् ॥ १०६ ॥

हिन्दी अर्थ

परमपुरुषार्थ दानरूप गुरु द्वारा किये गये उपकार की कोई दूसरी निष्कृति न देख रहे श्रीरामजी ने अब अपने सिर पर उनके चरण रखने के बहाने अपने को ही गुरु महाराज को समर्पित करके सबसे उत्कृष्ट ज्ञान की महिमा तथा स्वयं प्रत्यक्ष समनुभूत गुरु के माहात्म्य का वरँ पर उपस्थित सब लोगों को उपदेश दिया, यह कहते है । यों कहकर उस महात्मा वसिष्ठ महाराज के चरणों को अपने सिर पर रखकर सबकी आत्मा करुणासागर श्रीरामचन्द्रजी बोले : हे सभ्य पुरुषों, आप सब लोग हमारे इस निर्णय को अच्छी तरह सुन लीजिये, इससे आप लोगों का बड़ा कल्याण होगा । यह हमें बिलकुल निश्चित है कि आत्मतत्त्वज्ञान तथा आत्मतत्त्वज्ञानी गुरु से बढ़कर इस संसार में ओर कोई दूसरी वस्तु श्रेष्ठ नहीं है । सिद्ध आदि सब लोगों ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जेसा आप कह रहे हैं वैसा ही आपकी दया से हम लोगों के मन मेँ स्थित था ओर अब तो वह सब आपके इस संवाद से बिलकुल दृढ हो गया