Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verse 110
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 128, verse 110 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 110
संस्कृत श्लोक
इति रघुपतिसिद्धिः प्रोदिता या मया ते वरमुनिवचनालीरत्नमालाविचित्रा ।
निखिलकविकुलानां योगिनां सेव्यरूपा परमगुरुकटाक्षान्मुक्तिमार्गं ददाति ॥ ११० ॥
हिन्दी अर्थ
अब उपसंहार करते है ।
हे भरद्वाज, महाराज वसिष्ठजी की वचनपंक्तिरूपी रत्नमाला से भूषित यह जो श्रीरामचन्द्रजी
की सिद्धि मैंने तुमसे कही हे, वह निखिल कविकुलो और योगियों की सेवा के योग्य है तथा परम
गुरु के कृपाकटाक्ष से श्रवणादि के द्वारा सेवित होती हुई वह मुक्तिमार्ग को देती हे