Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 128, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
ब्रह्माण्डान्तः स्थितो योऽसावर्धनारीश्वरः प्रभुः ।
आधारः सर्वभूतानां कारणं तदुदाहृतम् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
*अव्याकृते स्थित: पश्चात्” (अव्याकृत में स्थित होकर उसके पीछे) इसकी व्याख्या के प्रसंग में
ब्रह्मविद्या के इच्छुक पुरुष को पहले उपास्यरूप से कही गयी, सारे ब्रह्माण्ड की आत्मा विराट् पुरुष के
हृवयकमल के ऊपर सदा स्थित रहनेवाली और ब्रह्मविद्या से घटित अर्ध शरीर से युक्त मायाशबल
सम्पूर्ण जगत् के अभिन्न निमित्तोपादान कारणरूप ब्रह्म की मूर्ति को दर्शा रहे महाराज वाल्मीकि मुनि
वही सम्पूर्ण प्राणियों का माता-पिता के रूप से भी कारण है यह बतलाते हैं।
सारे ब्रह्माण्ड के भीतर जो यह अर्धनारीश्वर भगवान् स्थित है वही सम्पूर्ण भूतों का आधार तथा
कारण कहा गया है