Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 128, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
स्वयमेवात्मनात्मानमानन्दं प्रतिपद्यते ।
न मत्तोऽस्त्यपरः कश्चिच्चिदानन्दमयः प्रभुः ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
कैसे आनन्दस्वरूप को प्राप्त होता है, इस पर कहते हैँ ।
मुझसे अतिरिक्त कोई दूसरा चिदानन्दमय प्रभु नहीं हे । अकेला मैं ही परब्रह्म हूँ, यों आत्मा भीतर
से प्रकाशित होता हे