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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verses 42–43

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 128, verses 42–43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 42,43

संस्कृत श्लोक

नेष्यसे यदि संसारचक्रावर्तभ्रमः शमम् । भरद्वाज उवाच । त्वयोक्तं सर्वमेवेदं ज्ञानं बुद्धं मया गुरो ॥ ४२ ॥ बुद्धिश्च निर्मला जाता संसारो न विलम्बते । इदानीं ज्ञातुमिच्छामि ज्ञानिनः कर्म कीदृशम् ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

भरद्वाज ने कहा : हे गुरो, आपके द्वारा कहा गया यह सब ज्ञान मुझे अवगत हो गया, मेरी बुद्धि एकदम निर्मल हो गयी, अब मेरा यह संसार चिरकाल तक नहीं टिक सकता । भगवन्‌, अव मैं यह जानना चाहता हूँ कि ज्ञानियों के लिए कैसा कर्म विहित है, यानी क्या उन्हें कर्मों का अनुष्ठान नहीं करना चाहिए, यदि करना चाहिए तो, क्यों केवल प्रवृत्तिरूप कर्मो का अनुष्ठान करना चाहिए, या निवृत्तिरूप कर्मो का (7)