Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verses 6–7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 128, verses 6–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 6,7

संस्कृत श्लोक

मांसादिपार्थिवं भागं पृथिव्यां प्रविलापयेत् । आप्यं रक्तादिकं चाप्सु तैजसं तेजसि क्षिपेत् ॥ ६ ॥ वायव्यं च महावायौ नाभसं नभसि क्षिपेत् । पृथिव्यादिषु विन्यस्य चेन्द्रियाण्यात्मयोनिषु ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

देह, इन्द्रिय आदि में जिसकी जिससे उत्पत्ति हुई है, उसका उसमें लय कर दे, यह जो कहा गया है उसका विशेषरूप से फिर विवरण करते हैं। मांस आदि जो पार्थिव भाग हैं उनका पृथिवी में, रक्त आदि जो जलीय भाग हैं उनका जल में तथा जो तेजस भाग हैं उनका तेज में, उनकी तन्मात्रारूपता जानकर लय कर दे । वायुभाग का महावायु में और आकाशभाग का आकाश में लय कर दे | इसी तरह घ्राण आदि इन्द्रियों का भी उनके आरम्भक देवतोपाधिभूत सूक्ष्म पृथिवी आदि में लय करके "दिशः श्रोतं भूत्वा कर्णौ प्राविशत्‌“ इत्यादि श्रुतिसिद्ध जीव के भाग की प्रसिद्धि के लिए कर्ण आदि गोलको मे प्रवेश द्वारा श्रोत्र आदिरूप इन्द्रियभाव को प्राप्त दिशा आदि देवताओं का क्रमशः उन देवताओं में ही लय कर दे