Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verse 61
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 128, verse 61 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 61
संस्कृत श्लोक
दर्शनात्स्पर्शनाच्छब्दात्कृपया शिष्यदेहके ।
जनयेद्यः समावेशं शांभवं स हि देशिकः ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
अपना शरीर छोडकर श्रीरामजी के शरीर में प्रविष्ट होकर मैने कुण्डलिनी का संचार आदि तो
किया है नहीं, फिर तुमने 'शक्तिपात” को समझ कैसे लिया, इस पर कहते हैँ ।
अपने दर्शन, स्पर्श ओर वाक्य प्रयोग से जो कृपा करके शिष्य के शरीर में शिव -स्वरूप परमात्मा
का प्रवेश उत्पन्न कर दे, वही गुरु हे । अमोघ संकल्पवाले आपके सदृश महापुरुषों की कृपादृष्टिसे भी
उत्तम शिष्य की कुण्डलिनी के षट्चक्रभेदन द्वारा ब्रह्मरन्ध्र में परम शिव का प्रवेशरूप शक्तिपात सिद्ध
हो जाता है, यह भाव है