Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verses 65–67
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 128, verses 65–67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 65-67
संस्कृत श्लोक
इदानीं कृपया रामव्युत्थानं कर्तुमर्हसि ।
पदे परिणतस्त्वं हि कार्याविष्टा वयं यतः ॥ ६५ ॥
स्मरन्कार्यं मम विभो यदुद्दिश्याहमागतः ।
प्रार्थितश्चातिकष्टेन राजा दशरथः स्वयम् ॥ ६६ ॥
तद्वृथा मा कृथाः सर्वं शुद्धेन मनसा मुने ।
देवकार्यं चरामान्यदवतारप्रयोजनम् ॥ ६७ ॥
हिन्दी अर्थ
यों महाराज वस्निष्ठजी की प्रशसा करके उपस्थित कर्तव्य बतलाते हैँ ।
भगवन्, हम लोगों के ऊपर दया करके अब आप श्रीरामचन्द्रजी को समाधि से उठा सकते हे,
क्योकि आप तो परमपद में कृतकृत्य हो चुके हैं, लेकिन हम लोग अभी तक सांसारिक कार्यो में ही फँसे
हुए हैं । हे विभो, बडे कष्ट के साथ जिसके लिए मैंने स्वयं राजा दशरथ से प्रार्थना की है ओर जिस
मतलब से यहाँ आपके पास आया हूँ उस मेरे निर्विघ्न यज्ञ सिद्धिरूप कार्य का स्मरण करते हुए आप
श्रीरामचन्द्रजी को अब समाधि से उठाने की कृपा कीजिये । हे मुने, मेरे उस सब कार्य को आप अपने
शुद्ध मन से व्यर्थ न बना डालें । श्रीरामचन्द्रजी के समाधि से उठने पर अन्य भी अवतार के प्रयोजन जो
देवताओं के कार्य हैं उनका भी हम लोग सम्पादन कर लेंगे