Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 14, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 14, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 14 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
सर्वेषामेव रागाणां राशिमद्राविव स्थितम् ।
सर्वसंध्याभ्रजालानां घनमेकमिवाकरम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
मेरुपर्वत के ऊपर समस्त
लालिमाओं का एक ढेर-सा होकर वह अवस्थित था या यों कहिए कि निखिल प्राणियों की
दर्शनाभिलाषाओं का एक पिण्ड बनकर वह स्थित था और निखिल सन्ध्याकालीन अभ्रजालों का घनीभूत
एक आकर-सा प्रतीत होता था