Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 15, Verses 25–27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 15, verses 25–27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 15 · श्लोक 25-27
संस्कृत श्लोक
तत्र पश्याम्यहं यावदेकान्ते स्कन्धकोटरे ।
विचित्रकुसुमास्तीर्णे विविधामोदशालिनि ॥ २५ ॥
पुण्यकृद्योषितां स्वर्गे प्रियस्तबकवासिताः ।
अपरिक्षुभिताकाराः सभायां वायसाः स्थिताः ॥ २६ ॥
विभेद्यमेघा वातेन समेनेवापसारिताः ।
तेषां मध्ये स्थितः श्रीमान्भुशुण्डः प्रोन्नताकृतिः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्यों ही मैंने वहाँ दृष्टि डाली, त्यों ही देखा कि एकान्त मेँ स्थित दाहिने तने के उस
कोटर पर जिसमें चित्र-विचित्र फूल बिछे हुए थे, अनेक प्रकार के सुगन्धो से जो सुगन्धित था तथा
पुण्यात्माओं द्वारा उपभोग्य अप्सराओं के उपभोगों के योग्य स्वर्गस्वरूप था - सभा में शान्ति आदि
गुणों से संपन्न होने के कारण अक्षुब्ध आकृतिवाले, पवन के द्वारा समभाग से छेदन कर कोटर में
प्रवेशित किये गये मेघो की नाई, मनोहर कुसुमगुच्छों से वासित कौए स्थित हैं और उनके बीच ऐश्वर्यशाली
एवं अत्यन्त उन्नत शरीरवाला वायसराज भुशुण्ड बैठा है