Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 18, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 18, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
नृत्यन्ति मातरस्तस्य पुरो भूतगणानताः ।
चतुर्दशविधानन्तभूतजातैकभोजनाः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
भूतगणो के ऊपर आधिपत्य रखने के कारण उनसे (भूतगणो से) नमस्कृत तथा चौदह भुवनो में
उत्पन्न होनेवाले असंख्य प्राणियों का ही भोजन करने वाली मातृका उस देवाधिदेव के सामने नृत्य
करती हैं