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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 19, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 19, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

संजातरतयो मत्ताः सर्वा हंस्य क्रमेण ताः । रेमिरे सह काकेनाप्यथ मत्तास्तदा किल ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर उस समय उत्पन्न-रति वे सभी हँसियाँ उन्मत्त होकर क्रमशः निकृष्टजातीय भी कौए के साथ रमण करने लगीं, क्योकि वे मत्त ही तो थीं । (ऊँची जाति की हँस़रियों की रति अपने से निकृष्ट जाति कौए के साथ यद्यपि अनुचित है, तथापि उसके होने में एकमात्र कारण उन्माद ही है, यह सूचन करने के लिए इस श्लोक में "अपि" शब्द का प्रयोग किया है /)