Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 19, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 19, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
जाता यथा वयमिमे स्थितिमागताश्च संप्राप्य बोधमुपशान्तधियो यथावत् ।
एतत्तदुक्तमविखण्डमलं मया ते शेषेण मां समनुशाधि महानुभाव ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
कहे गये वृत्तान्त का उपसंहार करते हैं।
हे महानुभाव, "तुम किस कुल में उत्पन्न हुए ?' “किस तरह ज्ञातज्ञेय हुए ?' और "तुम्हें यह निवास
कैसे प्राप्त हुआ ?'- ये जो तीन प्रश्न आपने पहले किये थे, उसके उत्तर में जिस प्रकार हम उत्पन्न
हुए, जिस प्रकार यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर हम लोग शान्त-बुद्धि होकर स्थित हुए एवं इस नीड में जिस
रीति से हम लोग आये, यह सब वृत्तान्त आपको अविकलरूप से भली प्रकार कह सुनाया, इसके बाद
“तुम्हारी कितनी आयु है ?* और "क्या अतीत वृत्तान्त जानते हो ?“-इन दो प्रश्नों के उत्तररूप से यदि
आप कहने के लिए हमें आज्ञा देंगे, तो उसे भी मैं आपसे कहूँगा