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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 2, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

पूर्वे ध्वस्ततयालोकं दृश्यमाने परेऽचले । शयालीकावतंसाभं तापको निकरो दधौ ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

अनन्तर पूर्वाभिमुख मनुष्यों द्वारा दिखाई पडनेवाले पूर्वदिशास्थ पर्वतो के ऊपर शिखरो से प्रतिबद्ध होने के कारण उन-उन शिखरो के भीतरी भागों से दण्डायमान प्रकाश निकल रहा था, अतएव वहाँ पर उन अन्तराल भागों से निकल रहे किरणोंवाले सूर्य ने फैलाये गये हाथों के सदृश प्रकाश धारण किया है ऐसा प्रतीत होता था, ओर जो पश्चिम दिशा में मुख किये हुए प्राणी थे, उनके द्वारा दिखाई पडनेवाले पश्चिम दिशास्थ पर्वत पर, तो सूर्य ने मिथ्याकल्पित शिरोभूषण की नाई मानों आलोक धारण किया है - ऐसा प्रतीत होता था