Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 2, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
दिक्कालाद्यनवच्छिन्नमदृष्टोभयकोटिकम् ।
एकं ब्रह्मैव हि जगत्स्थितं द्वित्वमुपागतम् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
देशतः, कालतः ओर वस्तुतः त्रिविध परिच्छेद से शून्य तथा देश ओर काल निबन्धन पूर्वं ओर अपर
दोनों सीमाओं या द्वैत के दर्शन से निर्मुक्त अद्वितीय परब्रह्म ही जगद्रूप से स्थित है, द्वित्व तो अज्ञान से
प्रतीत होता हे