Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 2, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
इति मत्वाहमित्यन्तर्मुक्त्वा मुक्तवपुर्महान् ।
एकरूपः प्रशान्तात्मा साक्षात्स्वात्मसुखो भव ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
उस प्रकार के ब्रह्मस्वरूप का निश्चय कर ओर “अहम्” अभिमान का
परित्याग कर आप मुक्त शरीर, महान, एकरूप, प्रशान्तात्मा तथा साक्षात् उत्तम आत्मस्वरूप (या
आकाश या आनन्दरूपः) हो जाइए