Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 2, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
याः संपदो याश्च दृशो याश्चितो यास्तदेषणाः ।
ब्रह्मैव तदनाद्यन्तमब्धिवत्प्रविजृम्भते ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, जो भोग्यरूप पदार्थ है, जो भोगार्थ
व्यापार हैं, जो उनमें प्रतिबिम्बित चिदाभास या स्मृतिर्यो हें ओर जो उन भोगों की इच्छाएँ हे इन सबके
रूप में आदि और अन्त से शून्य ब्रह्म ही समुद्र की नाई विकसित होता है