Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 2, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
तृष्णामोहपरित्यागान्नित्यशीतलसंविदः ।
पुंसः प्रशान्तचित्तस्य प्रबुद्धा त्यक्तचित्तभूः ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
तृष्णारूपी मोह के परित्याग से
अविनाशी सुशीतल आत्मज्ञान सम्पन्न तथा प्रशान्तचित्त पुरुष की आस्था से परित्यक्त चित्तभूमि
प्रबोधरूपी फल से समन्वित रहती है