Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 2, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
निश्चेतसो हि तत्त्वज्ञा नित्यं समपदे स्थिताः ।
लीलया प्रभ्रमन्तीह सत्त्वसंस्थितिहेलया ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्तवर्जित, सर्वदा परब्रह्मपद में अवस्थित, जो तत्त्वज्ञानी महात्मा हैं, वे सत्त्व में
स्थिति हो जाने के कारण प्राप्त हुई अनास्था से ही लीलावश व्यवहार करते हैं