Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 2, Verse 56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 2, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
चिदात्मासि निरंशोऽसि पारावारविवर्जितः ।
रूपं स्मर निजं स्फारं माऽस्मृत्या संमितो भव ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, अपने विशाल स्वरूप का आप
स्मरण कीजिए, चित्स्वरूप का विस्मरण करके आप परिच्छिन्न मत हो जाइए । आप अंशशून्य
(निरवयव) तथा पारावार से वर्जित चिदात्मस्वरूप ही हैं