Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 21, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 21, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
जगद्गलितमेर्वादि यात्येकार्णवतां यदा ।
वायवीं धारणां बद्ध्वा संप्लवेऽचलधीस्तदा ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
जब प्रलयकाल में जगत, जिसमें मेरु आदि पर्वत गल जाते
हैं, एक समुद्रस्वरूप हो जाता है, तब वायुसम्बन्धिनी धारणा बाँधकर एकमात्र वायु में ही तादात्म्य भाव
करता हुआ निश्चित-बुद्धि होकर ऊपर तैरता रहता हूँ